मन की स्याही

कविता, कहानी. समीक्षा, आलेख लेकिन व्याकरण मुक्‍त

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क्या खोज सकूंगी स्वयं को ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा …

क्या  खोज सकूंगी स्वयं को  ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा …

देखूं आईना जीवन का खुद को ढूंढू वहाँ

मैं बेटी जन्मी फिर पत्‍नी बनी और फिर माँ

अनजानी सी राहों में मुझ तक पहुंचे वो राह कहाँ ?

क्या  खोज सकूंगी स्वयं को  ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा ...

 मैं हर पल कुछ नया जोड़ती जाती
नये रिश्तों को बस जैसे ओढती जाती

मेरा अपना कुछ भी क्या मुझमें शेष रहा ?

क्या  खोज सकूंगी स्वयं को  ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा …

चाहा  एक साथी जो साथ चले जीवन भर
पाया लेकिन स्वयं को खो देने की कीमत पर

उसके भीतर खुदको ढूँडूं जाने छुपी कहाँ  ?

क्या  खोज सकूंगी स्वयं को  ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा …

 बेटी होकर पहचाने जाना अगर मैं नियत भी जानूँ
मैं हूं बोझ पिता के कन्धों पर आखिर कैसे मानूँ ?

ऐसे ही बोझिल प्रश्नों को मैंने जाने क्यों है सहा ?

क्या  खोज सकूंगी स्वयं को  ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा …

जीवन चुक जायेगा शायद पर क्या वो दिन आयेगा ?
मैं क्या हुं मेरे भीतर, क्या कोई जान मुझे पायेगा ?

या ये यक्ष प्रश्न रहेगा जीवित जब तक रहे जहाँ  ?

क्या  खोज सकूंगी स्वयं को  ? प्रश्न ये शेष सदा ही रहा …

                                                                                  देवेश 

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